Human story for 'Belief in the Ballot'

लेकतंत्र का एक सिपाही 'कुवर सिंह' भी
सुशील डोभाल, प्रवक्ता अर्थशास्त्र अटल उत्कृष्ट राजकीय इंटर कॉलेज जाखणीधार टिहरी गढवाल
विधानसभा सामान्य निर्वाचन 2022 में पिछले चुनावों की भांति मुझे एक बार फिर पीठासीन अधिकरी के रूप में योगदान सौंपा गया। प्रथम और द्वितीय चरण के प्रशिक्षण के बाद अंततः मैं अन्य निवार्चन अधिकरियों व कर्मचारियों के साथ तीसरे चरण के प्रशिक्षण के लिए निवाचन प्रशिक्षण केन्द्र पर पहुंचा, जहां मुझे पता चला की मेरी टीम को आरक्षित श्रेणी में रखा गया है। सामान्यतः निर्वाचन ड्यूटी में अधिकतर कार्मिक आरक्षित टीम में रहना नही चाहते, क्यूंकि आरक्षित टीम के सभी मतदान अधिकरियों को जहां निर्वाचन सम्पन्न होने तक ड्यूटी के लिए मुस्तैद रहना पडता है वहीं अनिश्चितता की स्थिति बनी रहती है। हर निर्वाचन अधिकारी की भांति मेरी प्राथमिकता भी पोलिंग बूथ पर पहुंच कर मतदान सम्पन्न करवाना था किन्तु आरक्षित टीम में रखे जाने के कारण अब परिस्थितियां बदल गयी थी। जिस प्रकार पोलिंग पार्टी द्वारा पोलिंग बूथ पर पहुंचकर निर्वाचन सम्पन्न करवाना बेहद महत्वपूर्ण कार्य होता है उसी प्रकार आरक्षित पोलिंग पार्टी का योगदान भी अपरिहार्य परिस्थितियों में अत्यन्त महत्वपूर्ण हो जाता है। यही सोचकर मैने अपने मन को स्थिर बनाया और अग्रिम आदेशों की प्रतिक्षा करने लगा।
    इसी दौरान मुझे मेरे एक पुराने शिक्षक मित्र मिल गये, जिन्हें मेरी भांति ही आरक्षित पोलिंग पार्टी के पीठासीन अधिकारी का दायित्व मिला था। कुछ देर उनके साथ बातचीत करने और पिछले चुनाव ड्यूटी के अनुवभ बांटने के बाद मतदान ड्यूटी में नियुक्त अन्य कुछ कर्मचारियों के साथ हम प्रशिक्षण व सामग्री वितरण केन्द्र के बाहर एक गली में चाय की दुकान पर जा पहुंचे। चाय बनाने वाला व्यक्ति कोई 60-65 वर्षीय वरिष्ट नागरिक प्रतीत होता था। चाय की चुस्कियों के बीच चुनावी चर्चा परिचर्चा चली तो चाय बाले बुजुर्ग का मतदान को लेकर उत्साह खुलकर सामने आ गया। सामान्य परिचय में बुजुर्ग ने अपना नाम कुंवर सिंह बताते हुए कहा कि वह टिहरी जिले के प्रतापनगर क्षेत्र के निवासी हैं और पिछले कई वर्षों से इस दुकान पर कार्य करते हैं। उनकी बातों को सुनकर लगा कि वाकई उन जैसे लाखों लोगों का विश्वास ही लोगतंत्र को जिंदा रख सकता है।
   बुजुर्ग कुंवर सिंह का कहना था कि ग्रामीण क्षेत्रों के अधिकतर पुरुष रोजगार और अपने परिवार के भरण-पोषण के सिलसिले में शहरी और नगरक्षेत्रों में रहने के लिए मजबूर हैं, लेकिन इसके बाबजूद भी बडी संख्या में गांव लौटकर वोट जरूर देते हैं। अपने गांव से लगातार हो रहे पलायन से परेशान बुर्जुग कुंवर सिंह चाहते हैं कि प्रत्येक मतदाता अपने वोट की उपयोगिता समझकर उसका सही उपयोग कर योग्य, शिक्षित और लोकतांत्रिक मूल्यों पर खरा उतरने वाले प्रत्याशी के पक्ष में मतदान कर लें तो लोकतंत्र का उद्देश्य अवश्य पूरा होगा, किन्तु निर्वाचन के दौरान शिक्षत और समझदार लोग भी जातिवाद, क्षेत्रवाद और भाई-भतीतावाद जैसी कुंठाओं से ग्रसित होकर लोकतंत्र की जडों को कमजोर करने का कार्य करते हैं। स्वयं 5वीं तक की शिक्षा ग्रहण करने बाले कुंवर सिंह को जब यह जानकारी हुयी कि हम लोग विभिन्न विद्यालयों में शिक्षक हैं तो चुनावी महापर्व के लिए उनकी अपेक्षाएं हम से और बढ गयी और उन्होने तुरंत यह अपील भी कर डाली कि हम अपने विद्यार्थियों को लोकतंत्र के आदर्शों को समझाते हुए भविष्य में निश्पक्ष एवं अनिवार्य मतदान के लिए अवश्य प्रेरित करें। वास्तव में कुंवर सिंह जैसे लाखों-करोड लोग हमारे लोकतंत्र की नीव हैं। बुजुर्ग कुंवर सिंह से विदा लेकर हम अब वापिस नियंत्रण कक्ष की ओर निकल पडे। लेकिन हम यह समझ चुके थे कि एक मामूली चाय वाला वास्तव में लोकतंत्र के लिए क्या अहमियत रख सकता है।

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