भाग-2 सुबह धूप नहीं थी। आसमान पर धुंध की एक पतली चादर बिछी थी और हवा में लोहे जैसी गंध। अब लेकी उठ चुकी थी। उसने थुपा वाले पत्थरों को देखा। रात को रखे त्सम्पा के कौर गायब थे। वो कुछ नहीं बोली, बस सिर झुकाकर फिर से हाथ जोड़ लिए। थैले से बचा हुआ थोड़ा त्सम्पा निकालकर मेरे हाथ में दिया। "आज पानी कम पीना। आगे चढ़ाई है और देवता का इलाका शुरू होगा। वहाँ बोलना कम, सुनना ज़्यादा।" हम खंडहर से निकले। बाहर मखमली घास पर ओस की जगह छोटे-छोटे कदमों के निशान थे। इंसान के नहीं। किसी बड़े पंजे के, पर उंगलियाँ तीन ही थीं। निशान सीधे पहाड़ की तरफ जा रहे थे, उसी रास्ते पर जहाँ हमें जाना था। लेकी ने निशानों को देखकर अपनी कमर से बंधी ऊन की डोरी खोल ली और मेरी कलाई पर बाँध दी। "ये निशानी है। रास्ता भटको तो ये गर्म हो जाएगी।" उसकी टूटी-फूटी हिंदी आज और साफ लग रही थी, जैसे डर ने शब्द सिखा दिए हों। मैंने पीछे मुड़कर खंडहर को देखा। दरवाज़े पर अब कोई छाया नहीं थी। पर दीवार पर कोयले से बना एक नया निशान उभर आया था। तीन आड़ी लकीरें। लेकी आगे बढ़ चुकी थी। मैं डोरी को मुट्ठी में भींचकर उसके पी...