Noise of Loneliness
Story by- Sushil Dobhal
न ज्ञान काम आया, न अनुभव, न प्रतिष्ठा, न रुतबा। बस रह गया एक जख्म, जो शायद कभी धुंधला हो न पाएगा। सच यही है कि इंसान आख़िर में अकेला रह जाता है। जब मन मर जाता है, तो इंसान का बचा ही क्या?
यह कहानी केवल सुधीर की ही नहीं, यह हर उस इंसान की कहानी है जो काम के जुनून में जीते-जीते खुद को ही खो देता है। सब अपने वक़्त पर हाथ खींच लेते हैं। जिस्म के अंदर किसी कोने पर एक दिल होता है, जो जब टूटता है, तो कोई आवाज़ नहीं करता, बस चुपचाप अपनी चाल बदल देता है। कभी जिसके इशारे पर संस्थान की हवा तक करवट लेती थी, आज उसी संस्थान के आंगन से लेकर गलियारे तक धूल का हर कण उसका मजाक बनाकर उपहास कर रहा था। यही जीवन का सच है, इंसान चाहे कितना भी बड़ा क्यों न बन जाए, अंत में रह जाता है वही अकेलापन। Read more...

अकेलेपन को एकांत में बदलने से जीवन का नजरिया ही बदल जाता है
ReplyDelete