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क्या 'नो डिटेंशन पॉलिसी' खत्म करने से सुधर पायेगा शिक्षा का स्तर??

राकेश पोखरियाल, शिक्षक।
शिक्षा के अधिकार अधिनियम 2009 के अनुच्छेद 16 में वर्णित No Detention policy को शिक्षा के स्तर को गिराने वाली व्यवस्था माना जाता रहा है। इसी कारण 22  राज्यों ने शिक्षा का स्तर गिरने की बात कहते हुए इसे समाप्त करने की मांग केंद्र सरकार से की थी। उत्तराखंड में निशुल्क और अनिवार्य  शिक्षा के अधिकार (आरटीई) के तहत पांचवीं और आठवीं में पास होने की अनिवार्यता अब खत्म हो गई है और इसके साथ ही फेल न करने की नीति को लेकर एकबार फिर बहस शुरू हो गयी है। इस मुद्दे पर पौड़ी गढ़वाल से शिक्षक राकेश पोखरियाल "हिमवंत" के माध्यम से अपने विचार पाठकों तक यहां पहुचाने का प्रयास कर रहे हैं।
     संविधान की धारा 21 A के तहत 14 वर्ष तक के बच्चों को प्रदत्त शिक्षा का अधिकार अधिनियम-2009 के अनुच्छेद 16 में उल्लिखित NDP (No Detention Policy) अर्थात कक्षा 8 तक फेल न करने की नीति आजकल चर्चा में है। लोकसभा व राज्यसभा दोनो में इस नीति में संशोधन विधेयक हाल ही में पारित किया गया है। संशोधन के अनुसार राज्य सरकारें इस नीति को दोनों ही रूप में लागू करने हेतु स्वतंत्र हैं। इसके प्रभाव के पक्ष व विपक्ष में विचार सामने आते रहे हैं। कुछ इस प्रकार हैं... 
NDP के प्रभाव - पक्ष में तर्क
1- शिक्षा का अधिकार अधिनियम में धारा 16 के अंतर्गत नो डिटेंशन पॉलिसी का प्राविधान सीखने को बढ़ावा देने के लिए नहीं बल्कि वर्ग 1 से 8 तक कि प्रारंभिक शिक्षा को पूरी करने के दौरान बीच में पढ़ाई छोड़ने यानी ड्रॉप-आउट की संभावना से निपटने के लिए किया गया था। यह नीति यह सुनिश्चित करती है कि बच्चों को बिना असफल होने के डर से प्रारंभिक शिक्षा पूरी होने तक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त हो सके।
2- इसके अंतर्गत CCE अर्थात सतत एवं व्यापक मूल्यांकन का प्राविधान है जो बच्चे में अंतर्निहित किसी भी प्रकार के विशिष्ट गुणों के प्रस्फुटन को बल देती है और उन्ही गुणों के आधार पर कक्षोन्नति का अधिकार प्रदान करती है।
3-  यह नीति बच्चे के मानसिक दबाव को नियंत्रित करती है।
4- यह नीति उम्र के साथ होने वाले प्राकृतिक विकास में समानता का अधिकार प्रदान करती है, इस नीति के अनुसार छात्र को उम्र के आधार पर कक्षा 8 तक कि किसी भी कक्षा में प्रवेश का अधिकार प्रदान करती है, चाहे उसने उससे पूर्व की कक्षाओं में अध्ययन भी न किया हो।
4- यह नीति न्यूनतम शैक्षिक योग्यता का अधिकार प्रदान करती है।
5- इस नीति से शिक्षा का सार्वभौमिकीकरण एवं उच्चतम litracy लेवल सहजता से प्राप्त किया जा सकता है।
NDP के प्रभाव- विपक्ष
1- विधायिका द्वारा एनडीपी को समाप्त करने का निर्णय सामाजिक-आर्थिक और शैक्षणिक रूप से वंचित और हाशिये से आने वाले बच्चों, विशेषकर प्रथम पीढ़ी के शिक्षार्थी को स्कूली शिक्षा व्यवस्था से बाहर बाल मज़दूरी जैसे अमानवीय कार्य में धकेल कर के असमानताओं में वृद्धि करेगा।
2-  स्कूलों में प्रभावी पठन-पाठन सुनिश्चित करने और सीखने के स्तर में सुधार के लिए क्लासरूम और घरेलू कारकों सहित अन्य बहुआयामी पक्षों की चुनौतियों से निपटना होगा।
3- बिहार जैसे राज्य जहां यू-डाइस के सरकारी आंकड़ों के अनुसार प्रारंभिक शिक्षा पूरी किये बगैर पढ़ाई छोड़ने वाले (ड्रॉप-आउट) बच्चों की संख्या सर्वाधिक है, शिक्षा व्यवस्था में तमाम सुधार की कवायदों के वावजूद हालात बेहद चिंताजनक हैं। बिहार सहित उत्तराखंड की राज्य सरकार को दूरदर्शिता का परिचय देते हुए बच्चों को फेल करने की इस नीति (एनडीपी) को लागू नहीं करना चाहिए।
4- यह बच्चों को और साक्ष्यविहीन निर्णय से बचा सकता है, क्योंकि बच्चों को प्रारंभिक कक्षाओं में फेल करके रोकने से सीखने के स्तर में सुधार नहीं होगा
5- शिक्षकों का एक वर्ग NDP में निहित शिथिलता को सम्पूर्ण कक्षा व विद्यालय की अनुशासनहीनता कारण मानकर इसके विपक्ष में विचार प्रकट करते रहे हैं।
    इस प्रकार पक्ष व विपक्ष के समस्त विषय विन्दुओं पर गहनता से विचार करने की आवश्यकता है, ताकि मानव संसाधन के रूप में हम उच्चकोटि के नागरिक विकसित कर एक श्रेष्ठ राष्ट्र निर्माण की राह प्रशस्त कर सकें।

नोट-  लेखक राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय रिंगवाडी विकासखण्ड एकेश्वर पौड़ी गढ़वाल में विज्ञान शिक्षक के पद पर कार्यरत हैं।

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