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लॉकडाउन में छात्र शिक्षा विभाग के पोर्टल पर ऐसे पढ़ें सभी विषयों के उपयोगी नोट्स।

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     लॉकडाउन के कारण बच्‍चों की पढ़ाई  के साथ ही शैक्षिक सत्र के भी जहां काफी पिछड़ जाने की आशंका बन रही है वहीं आपदा के समय मे विद्यलयी शिक्षा विभाग का पोर्टल स्कूली बच्चों के लिए कारगर सावित हो रहा है। विभागीय निर्देशों पर शिक्षक अपने विषयों के उपयोगी नोट्स पीपीटी, पीडीएफ और वीडियो स्लाइड के माध्यम से विभागीय पोर्टल पर अपलोड कर रहे हैं और लॉकडाउन के कारण स्कूल कॉलेज बन्द रहने के कारण पोर्टल से नोट्स डाइनलोड कर अध्ययन कर रहे हैं।      पूरी दुनिया इस समय कोरोना वायरस नामक अदृश्य दुश्मन से जूझ रही है और इस महासंकट से निपटने के लिए सभी लोग घरों में लॉकडाउन के दौर से गुजर रहे हैं. इस समय विद्यलयी शिक्षा विभाग का पोर्टल बच्चों की पढ़ाई के लिए अच्छा विकल्प सावित हो रहा है। पोर्टल के माध्यम से विद्यार्थी घरों में रहते हुए पढ़ाई कर समय का सदपयोग कर रहे हैं। हालांकि राज्यभर में बड़ी मात्रा में ऐसे विद्यार्थी भी मौजूद है जिनके पास इंटरनेटयुक्त स्मार्टफोन नही है जबकि कई क्षेत्रों में इंटरनेट कनेक्टिविटी की समस्या के कारण यह सुविधा विद्यार्थियों की पहुंच से बाहर है। ऐसे विद्यार्थी उत्तराखंड द

शिक्षा विभाग में अब होंगे बंपर प्रमोशन, इन्हें मिलेगा प्रमोशन के लाभ

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      लंबे समय से प्रमोशन की राह देख रहे शिक्षा विभाग के अधिकारी-कार्मिकों के लिए अच्छी खबर है। सरकार ने शिक्षा विभाग में प्रमोशन प्रक्रिया को शुरू करने के आदेश दे दिए। निदेशक,मंडलीय अपर निदेशक और सीईओ-डीईओ स्तर पर होने वाले सभी प्रमोशन को शुरू किया जाएगा। इस फैसले का लाभ करीब पांच हजार शिक्षक-कर्मचारियों को इसका लाभ मिल सकता है। शिक्षा सचिव आर मीनाक्षीसुंदरम ने अधिकारियों को कार्यवाही के आदेश दिए हैं।      यूं होंगे प्रमोशन: - शिक्षक: 1800 से ज्यादा शिक्षकों का प्रवक्ता पद पर प्रमोशन होना है। इसकी प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। केवल हाईकोर्ट से औपचारिक अनुमति की जरूरत है। बेसिक स्तर पर सहायक अध्यापक का जूनियर हाईस्कूल के सहायक अध्यापक और प्राइमरी के हेडमास्टर पर प्रमोशन होने हैं। एलटी कैडर में 40 कोटे के तहत भी बेसिक शिक्षकों के प्रमोशन होने हैं। इनकी संख्या काफी ज्यादा है। अकेले नैनीताल में ही 500 प्रमोशन पिछले चार साल से लटके हुए हैं। - प्रधानाचार्य और हेडमास्टर: सरकारी स्कूलों में प्रधानाचार्य के 875 और हेडमास्टर के 201 पद रिक्त हैं। इन पदों को लेकर विचार मंथन जारी है। सरकार
अर्थशास्त्र के सवाल और जवाब लाइसेंस कार्यक्रम किससे संबंधित है? उत्तर. स्वरोजगार हेतु ग्रामीण युवकों से केंद्र सरकार द्वारा लगाए गए तीन करो के नाम बताएं? उत्तर.सीमा शुल्क, निगम कर, आयकर, 14वें वित्त आयोग ने केंद्रीय करों में राज्य के लिए कितने प्रतिशत राशि की संतुति की है? उत्तर. 42.0% भारत में पहली पंचवर्षीय योजना कब शुरू हुई थी? उत्तर. 1 अप्रैल 1951 ई. बूल एवं बीयर शब्द संबंधित है? उत्तर. शेयर बाजार से तीन प्रत्यक्ष कारों के नाम बताइए? उत्तर. आयकर, संपत्ति कर, उपहार कर, बिक्री कर कौन लगाता है? उत्तर. राज्य सरकार भारत में जीएसटी(GST,वस्तु एवं सेवा कर) कब से लागू हुआ है? उत्तर. 1 जुलाई, 2017 ई. किसी वस्तु पर इकोमार्क सिंह दर्शाता है कि यह उत्पाद? उत्तर. पर्यावरण की दृष्टि से अनुकूल है भारत में राष्ट्रीय आय की गणना का कार्य कौन करता है? उत्तर. केंद्रीय सांख्यिकीय संगठन देश में कृषि एवं ग्रामीण विकास हेतु वित्त उपलब्ध कराने वाली सर्वोच्च संस्था कौन सी है? उत्तर. नाबार्ड राजस्थान में तृतीय क्षेत्र का संबंध है? उत्तर. परिवहन, व्यापार, डाक सेवा, वर्ष 2011 की जनगणन
भारत की जनसंख्या जनगणना जनगणना से तात्पर्य एक निश्चित समय पर किसी देश की जनसंख्या, लिंग, घनत्व, साक्षारता, व्यवसाय, जाति, धर्म, आयु आदि से संबन्धित आंकड़ो के संग्रहण संकलन और प्रकाशन की सांख्यिकीय प्रक्रिया है । सरकार इन्ही आंकडो के आधार पर संसाधनो का आवंटन करती है तथा देश के विकास के लिए योजनाओं का निर्माण करती है । भारत में जनगणना का इतिहास काफी प्राचीन है । भारत में जनगणना के संदर्भ में कौटिल्य और प्लूटो द्वारा रचित ग्रन्थों में विस्तार से उपलब्ध है । अंग्रेजों के शासन काल में सर्वप्रथम जनगणना लॉर्ड मेयो के शासन काल में 1872 से की गई थी , परन्तु नियमित जनगणना 1881 से लॉर्ड रिपन के शासन से मानी जाती है , जनगणना का कार्य प्रत्येक 10 वर्ष बाद किया जाता है तथा वर्ष 1872 से अब तक कुल 15 जनगणना कराई जा चुकी है और स्वतंत्र भारत की 7 जनगणना सम्पन्न हो चुकी है अन्तिम बार जनगणना 2011 में सम्पन्न की गयी थी और अगली जनगणना वर्ष 2021 में की जायेगी । जनगणना कराने का कार्य केन्द्र सरकार का होता है इसके लिए जनगणना अधिकतम , 1948 बनाया गया तथा इसी के द्वारा केन्द्र सरकार भारत के महारजिस्ट्रार त
आर्थिक शब्दावली मुदा अवमूल्यन (Money Devaluation) यह कार्य सरकार द्वारा किया जाता है। इस क्रिया से मुद्रा का केवल बाह्य मूल्य कम होता है। जब देशी मुद्रा की विनिमय दर विदेशी मुद्रा के अनुपात में अपेक्षाकृत कम कर दी जाती है, तो इस स्थिति को मुद्रा का अवमूल्यन कहा जाता है। रेंगती हुई मुद्रास्फीति (Creeping Inflation) मुद्रास्फीति का यह नर्म रूप है। यदि अर्थव्यवस्था में मूल्यों में अत्यंत धीमी गति से वृद्धि होती है तो इसे रेंगती हुई स्फीति कहते हैं। अर्थशास्त्री इस श्रेणी में एक फीसदी से तीन फीसदी तक सालाना की वृद्धि को रखते हैं। यह स्फीति अर्थव्यवस्था को जड़ता से बचाती है। रिकॉर्ड तारीख (Record List) बोनस शेयर, राइट शेयर या लाभांश आदि घोषित करने के लिए कंपनी एक ऐसी तारीख की घोषणा करती है जिस तारीख से रजिस्टर बंद हो जाएंगे। इस घोषित तारीख तक कंपनी के रजिस्टर में अंकित प्रतिभूति धारक ही वास्तव में धारक माने जाते हैं। इस तारीख को ही रेकॉर्ड तारीख माना जाता है। रिफंड ऑर्डर (Refun Order) यदि किसी शेयर आवेदन पत्र पर शेयर आवंटन की कार्यवाही नहीं होती तो कंपनी को आवेदन पत्र के सा
भारत एवं विश्व व्यापार 1991 से भारत में बहुत तेज आर्थिक प्रगति हुई है जब से उदारीकरण और आर्थिक सुधार की नीति लागू की गयी है और भारत विश्व की एक आर्थिक महाशक्ति के रूप में उभरकर आया है। सुधारों से पूर्व मुख्य रूप से भारतीय उद्योगों और व्यापार पर सरकारी नियंत्रण का बोलबाला था और सुधार लागू करने से पूर्व इसका जोरदार विरोध भी हुआ परंतु आर्थिक सुधारों के अच्छे परिणाम सामने आने से विरोध काफी हद तक कम हुआ है। व्यापार संगठन :- गैट की स्थापना के बाद बहुराष्ट्रीय व्यापार प्रणाली के विकास के फलस्वरूप 1 जनवरी, 1995 को विश्वव्यापार संगठन की स्थापना हुई। 15 अप्रैल, 1994 को 123 देशों के वाणिज्य मत्रियों ने मराकेश में उरुग्वे दौर में ऑतम अधिनियम पर अपने हस्ताक्षर किए थे। विश्व व्यापार संगठन एक स्थायी संगठन है तथा इसकी स्थापना सदस्य राष्ट्रों की संसदों द्वारा अनुमोदित एक अंतरराष्ट्रीय संधि के आधार पर हुई है। 1947 में विचार-विमर्श करके, गैट 1 जनवरी, 1948 को एक अंतरिम व्यवस्था के रूप में अस्तित्व में आया। मूलतः इसमें 23 हस्ताक्षरकर्ता थे जो उस समय अंतरराष्ट्रीय व्यापार संगठन के लिए विस्तृत दिशा-
भारत में कृषि भारत एक कृषि प्रधान देश है क्योंकि आज भी भारत के कुल श्रम शक्ति का 54% भाग कृषि क्षेत्र में रोजगार पाता है। भारत में कुल 15 कृषि जलवायुवीक प्रदेश पाए जाते हैं। हर पौधा एक विशिष्ट जलवायु दशा में ही अपना विकास कर सकता है यही कारण है कि भारत में तीन प्रकार की फसल ऋतुएँ पाई जाती हैं। 1- खरीफ फसल खरीफ फसल मुख्य रूप से मानसून काल की फसल है। जून-जुलाई में बोया जाता है और अक्टूबर में काट लिया जाता है। धान, ज्वार, बाजरा, मक्का, – खाधान्न मूंग, उड़द, सोयाबीन, लोबिया – दलहन सोयाबीन, मूंगफली, सूरजमुखी, तील, अंडी, कपास तंबाकू – तिलहन सोयाबीन दलहन एवं तिलहन दोनों की श्रेणी में आता है। 2- रबी फसल शीत ऋतु की फसल – Oct – nov मैं बोला जाता है और apr – may में काटा जाता है। खाद्यान – गेहूँ, जौ दलहन – मटर, चना, अरहर, मसूर तिलहन – सरसों नकदी फसल – गन्ना, बरसीम – मवेशियों का चारा 3 - जायद फसल रबी और खरीफ के बीच का मौसम ग्रीष्म ऋतु की फसल पानी की कमी अर्थात आर्द्रता की कमी हो जाती हैं जिसके कारण ऐसी फसलें उगती हैं जो अपने अंदर लंबे समय तक नमी धारण कर स
नई आर्थिक नीति आजादी के बाद 1991 का साल भारत के आर्थिक इतिहास में एक मील का पत्थर साबित हुआ। इससे पहले देश एक गंभीर आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहा था। और इसी संकट ने भारत के नीति निर्माताओं को नयी आर्थिक नीति को लागू के लिए मजबूर कर दिया था । नयी आर्थिक नीति के तहत निम्नलिखित कदम उठाए गए: (I) वाणिज्यिक बैंकों द्वारा ब्याज दर का स्वयं निर्धारण: उदारीकरण नीति के तहत सभी वाणिज्यिक बैंकों ब्याज की दर निर्धारित करने के लिए स्वतंत्र होंगे । उन्हें भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा निर्धारित ब्याज की दरों को मानने की कोई बाध्यता नहीं होगी । (II) लघु उद्योग (एसएसआई) के लिए निवेश सीमा में वृद्धि: लघु उद्योगों में निवेश की सीमा बढ़ाकर 1 करोड़ रुपये कर दी गयी है, जिससे ये कंपनियों अपनी मशीनरी को उन्नत बनाने के साथ अपनी कार्यकुशलता में सुधार कर सकते हैं। (III) सामान आयात करने के लिए पूंजीगत स्वतंत्रता: भारतीय उद्योग अपने समग्र विकास के लिए विदेशों से मशीनें और कच्चा माल खरीदने के लिए स्वतंत्र होंगे। (V) उद्योगों के विस्तार और उत्पादन के लिए स्वतंत्रता: इस नए उदारीकृत युग में अब उद्योग अपन

कक्षा 11, अर्थशास्त्र विषय के विद्यार्थियों के लिए "निर्धनता" से सम्बंधित उपयोगी नोट्स.

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गरीबी - गरीबी का अर्थ है वह स्थिती जब किसी व्‍यक्ति को जीवन की निम्नतम आधार भूत जरूरत- भोजन, वस्त्र, एवं आवास भी उपलब्‍ध नहीं हो पाते । मनुष्य जब बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति की स्थिती में नहीं होता तब उसे गरीब की श्रेणी में गिना जाता है। विकासशील देशों के संबंध में पहला वैश्विक गरीबी अनुमान वर्ल्‍ड डेवलपमेंन्‍ट रिपोर्ट 1990ई में मिलता है। वर्ल्‍ड डेवलपमेंन्‍ट रिपोर्ट में गरीबी को परिभाषित करते हुए कहा है कि गरीबी निम्नतम जीवनयापन स्‍तर करने की असमर्थता है, यानी जब निम्नतम जीवनयापन-स्‍तर भी प्राप्‍त नहीं किया जा सके तब उस स्थिती को गरीबी कहते है। सेद्धान्तिक रूप में गरीबी की माप करने के लिए सापेक्षित एवं निरपेक्ष प्रतिमानों का प्रयोग करते है। 1. सापेक्ष गरीबी : सापेक्ष गरीबी यह स्पष्ट करती है कि विभिन्‍न आय वर्गों के बीच कितनी विषमता है। प्राय: इसे मापने की दो विधियां है।  a. लॉरेंज वक्र    b. गिनी गुणांक लॉरेंज वक्र जितनी ही पूर्ण समता रेखा के पास होगी, आय की विषमता उतनी ही कम होगी। लॉरेंज वक्र तथा गिनी गुणांक आय की विषमता की माप से संबंधित है, आय की विषमता को प्रतिव्‍यक्ति आ

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