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Class 11 Economics: Chapter 2 1950 से 1990 तक भारतीय अर्थव्यवस्था (INDIAN ECONOMY 1950–1990)

Chapter 2

1950 से 1990 तक भारतीय अर्थव्यवस्था (INDIAN ECONOMY 1950–1990)

  • भारत 15 अगस्त, 1947 के दिन स्वतंत्र हुआ। अंततः 200 वर्षों के ब्रिटिश शासन के बाद राष्ट्र के नव-निर्माण का कार्य स्वयं देशवासियों का था। स्वतंत्र भारत के नेताओं को अन्य बातों के साथ ये भी तय करना था कि देश के लिए कौन-सी आर्थिक प्रणाली सबसे उपयुक्त रहेगी, जो केवल कुछ लोगों के लिए नहीं, बल्कि सर्वजन कल्याण के लिए कार्य करें।

विभिन्न प्रकार की आर्थिक प्रणालियाँ:

  • आजादी के बाद जवाहरलाल नेहरु सहित अन्य भारतीय नेताओं को समाजवाद का प्रतिमान सबसे अच्छा लगा। किंतु वे भूत-पूर्व सोवियत संघ की उस नीति के पक्षधर नहीं थे, जिसमें उत्पादन के सभी साधन (खेत और कारखाने) सरकार के स्वामित्व के अंतर्गत थे।
  • लोकतंत्र के प्रति वचनबद्ध भारत जैसे देश में सरकार के लिए पूर्व सोवियत संघ की तरह अपने नागरिकों के भू-स्वामित्व के प्रतिमानों तथा अन्य संपत्तियों को परिवर्तित करना संभव नहीं था।
  • नेहरु तथा स्वतंत्र भारत के अनेक अन्य नेताओं और चिंतकों ने मिलकर ऐसी आर्थिक प्रणाली अपनाई जो समाजवाद की श्रेष्ठ विशेषताओं से युक्त, किंतु कमियों से मुक्त थी। इसके अनुसार भारत एक ऐसा समाजवादी समाज होगा, जिसमें सार्वजनिक क्षेत्रक एक सशक्त भूमिका में होगा, लेकिन साथ ही निजी संपत्ति और लोकतंत्र का भी अहम स्थान होगा।

  • योजनाएक योजना यह बताती है कि किसी राष्ट्र के संसाधनों का उपयोग कैसे किया जाना चाहिए। योजना के कुछ सामान्य लक्ष्य और साथ ही विशिष्ट उद्देश्य होते हैं, जिनको समय की एक निर्दिष्ट अवधि के भीतर पूरा करना होता है

वर्ष 1950 में प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में योजना आयोग की स्थापना की गई। इस प्रकार पंच-वर्षीय योजनाओं के युग का सूत्रपात हुआ।

  • योजना आयोग के प्रमुख कार्य:
  1. देश के संसाधनों का आँकलन करना।
  2. इन संसाधनों के प्रभावी उपयोग के लिए पंचवर्षीय योजनाओं का निर्माण करना।
  3. प्राथमिकताओं का निर्धारण और योजनाओं के लिए संसाधनों का आवंटन करना।
  4. योजनाओं के सफल कार्यान्वयन के लिए आवश्यक मशीनरी का निर्धारण करना।
  5. योजनाओं की प्रगति का आवधिक मूल्यांकन करना।
  • योजना आयोग, भारत सरकार की एक संस्था थी जिसका प्रमुख कार्य पंचवर्षीय योजनाएँ बनाना था और आर्थिक लक्ष्यों को पूरा करने के लिए संसाधनों का आवंटन करना था। 15 मार्च 1950 को केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा पारित प्रस्ताव के द्वारा योजना की स्थापना की गई थी।
  • प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 13 अगस्त 2014 को योजना आयोग को भंग कर दिया और इसकी जगह पर नीति आयोग (NITI: National Institute for Transforming India : राष्ट्रीय भारत परिवर्तन संस्थान) का गठन हुआ। नीति आयोग भारत सरकार का एक थिंक-टैंक है।  

  • पंचवर्षीय योजनाएँ: प्रत्येक 5-वर्ष के लिए सरकार विकास कार्यों को तय समय सीमा में पूरा करने के लिए सामूहिक रूप से कुछ योजनाएँ तैयार किया करती थी, जिसमें इन लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए कार्यक्रम एवं नीतियों का निर्धारण किया जाता था। इन योजनाएँ के 5-वर्ष के लिए होने के कारण इन्हें पंचवर्षीय योजनाएँ कहते हैं।

पंचवर्षीय योजना के प्रलेखों में केवल पाँच वर्ष की योजना अवधि में प्राप्त किए जाने वाले उद्देश्यों का ही उल्लेख नहीं किया जाता था, अपितु उनमें आगामी 20 वर्षों में प्राप्त किए जाने वाले उद्देश्यों का भी उल्लेख होता था। 20 वर्ष के लिए बनाई गई इस दीर्घकालिक योजना को परिप्रेक्ष्यात्मक योजना कहते हैं।

  • भारत में पंचवर्षीय योजनाओं के लक्ष्य:
  1. संवृद्धि (Growth)
  2. आधुनिकीकरण (Modernisation)
  3. आत्मनिर्भरता (Self-Reliance)
  4. समानता (Equality)

  • संवृद्धि: इसका अर्थ है देश में वस्तुओं और सेवाओं की उत्पादन क्षमता में वृद्धि। आर्थिक संवृद्धि का प्रामाणिक सूचक सकल घरेलू उत्पाद (जी.डी.पी.) में निरंतर वृद्धि है।
  • सकल घरेलू उत्पाद (जी.डी.पी.) एक वर्ष की अवधि में देश की सीमा में उत्पादित सभी वस्तुओं और सेवाओं का बाजार मूल्य होता है।
  • देश का सकल घरेलू उत्पाद देश की अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रकों से प्राप्त होता है। ये क्षेत्रक कृषि क्षेत्रक (Agriculture)औद्योगिक क्षेत्रक (Industry) और सेवा क्षेत्रक (Services) हैं।
  • यदि भारतीय जनता को अधिक समृद्ध और विविधतापूर्ण जीवन यापन करना है, तो वस्तुओं और सेवाओं का अधिक उत्पादन करना आवश्यक है।
  • कुछ देशों में सकल घरेलू उत्पाद की संवृद्धि में कृषि का योगदान अधिक होता है तो कुछ में सेवा क्षेत्रक की वृद्धि इसमें अधिक योगदान करती है। भारत में सेवा क्षेत्रक जीडीपी में सर्वाधिक योगदान देता है, लेकिन रोजगार की दृष्टि से सर्वाधिक लोग आज भी कृषि क्षेत्रक में कार्यरत हैं|

  • आधुनिकीकरण: 
  • वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन बढ़ाने के लिए उत्पादकों को नई प्रौद्योगिकी अपनानी पड़ती है। उदाहरण के लिए, किसान पुराने बीजों के स्थान पर नई किस्म के बीजों का प्रयोग कर खेतों की पैदावार बढ़ा सकता है। उसी प्रकार, एक फैक्ट्री नई मशीनों का प्रयोग कर उत्पादन बढ़ा सकती है। नई प्रौद्योगिकी को अपनाना आधुनिकीकरण का मुख्य हिस्सा है।
  • आधुनिकीकरण का उद्देश्य सामाजिक दृष्टिकोण में परिवर्तन लाना भी है, जैसे यह स्वीकार करना कि महिलाओं के अधिकार भी पुरुषों के समान होने चाहिए। आधुनिक समाज में नारी की प्रतिभाओं का घर से बाहर- बैंकों, कारखानों, विद्यालयों आदि स्थानों पर प्रयोग किया जाता है और अधिकांशतः ऐसे समाज तेजी से समृद्धशाली होते जाते हैं।

  • आत्मनिर्भरता: 
  • हमारी प्रथम सात पंचवर्षीय योजनाओं में आत्मनिर्भरता को विशेष महत्व दिया गया, जिसका अर्थ है कि उन चीजों के आयात से बचा जाए जिनका देश में ही उत्पादन संभव है।
  • इस नीति को, विशेषकर खाद्यान्न के लिए अन्य देशों पर निर्भरता कम करने के लिए आवश्यक समझा गया।

  • समानता के साथ संवृद्धि:
  • केवल संवृद्धि, आधुनिकीकरण और आत्मनिर्भरता के द्वारा ही जनसामान्य के जीवन में सुधार नहीं आ सकता। किसी देश में उच्च संवृद्धि दर और विकसित अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी का प्रयोग होने के बाद भी अधिकांश लोग गरीब हो सकते हैं।
  • इसीलिए यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि आर्थिक संवृद्धि के लाभ केवल धनी लोगों तक ही सीमित न रहकर देश के निर्धन वर्ग को भी सुलभ हों। अतः संवृद्धि, आधुनिकीकरण और आत्मनिर्भरता के साथ-साथ समानता भी महत्त्वपूर्ण है।
  • प्रत्येक भारतीय को भोजन, अच्छा आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएँ जैसी मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा कर पाने में समर्थ होना चाहिए और धन संपत्ति के वितरण की असमानताएँ भी कम होनी चाहिए।

  • भारतीय योजना के शिल्पकार ‘प्रशांत चन्द्र महालनोबिस’: महालनोबिस जी का जन्म 1983 में कलकत्ता में हुआ था। इनकी शिक्षा प्रेसीडेंसी कॉलेज, कोलकाता तथा सेंट्रल यूनिवर्सिटी, इंग्लैंड में हुई।
  • पी. सी. महालनोबिस ने बड़े पैमाने पर सैंपल सर्वे को तैयार करने में योगदान दिया। उनके इसी योगदान के चलते उन्हें भारत में मॉडर्न स्टैटिस्टिक्स (आधुनिक सांख्यिकी) का पिता भी कहा जाता है। आर्थिक योजना और सांख्यि‍की विकास के क्षेत्र में प्रशांत चन्द्र महालनोबिस के उल्‍लेखनीय योगदान के सम्‍मान में भारत सरकार उनके जन्मदिन ‘29 जून’ को हर वर्ष 'सांख्यि‍की दिवस' के रूप में मनाती है।
  • 1920 में महालनोबिस विज्ञान कांफ्रेंस में भाग लेने पुणे गए थे। वहाँ स्थित ज़ूलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया के निदेशक ने उन्हें कलकत्ता में रहने वाले ऐंग्लो-इंडियन लोगों पर शोध करने को कहा। इस शोध में उन्होंने ‘महालनोबिस दूरी’ का सिद्धांत प्रतिपादित किया। यह एक तरह की सांख्यिकीय माप है, जिसका इस्तेमाल जनसंख्या संबंधी अध्ययन के लिए किया जाता है।
  • 1954 में पी. सी. महालनोबिस ने दूसरी पंचवर्षीय योजना का ड्राफ्ट योजना आयोग को दिया। इसमें कहा गया था कि अगर देश में त्वरित औद्योगिक तरक्की करनी है तो सरकार के सार्वजनिक उपक्रम अहम भूमिका निभाएँगे और भारी उद्योग जैसे: स्टील, सीमेंट आदि पर ध्यान केंद्रित करना होगा। पूँजीगत वस्तुओं (Capital Goods) के निर्माण की भी इसमें बात की गयी जिससे त्वरित रोज़गार उत्पन्न हो।
  • दूसरी योजना अवधि के दौरान, महालानोबिस ने भारत के आर्थिक विकास के लिए भारत और विदेश के प्रतिष्ठित अर्थशास्त्रियों को आमंत्रित करने की सलाह दी।
  • आज अनेक अर्थशास्त्री महालनोबिस के योजना संबंधी दृष्टिकोण को अस्वीकार करते हैं। परंतु भारत को आर्थिक प्रगति के पथ पर अग्रसर करने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका के लिए उन्हें सदैव स्मरण किया जाएगा।

  • भू-सुधार:
  • कृषि में समानता के साथ-साथ उत्पादन बढ़ाने के लिये भू-सुधारों की आवश्यकता हुई, जिसका मुख्य उद्देश्य जोतों के स्वामित्व में परिवर्तन करना था।
  • स्वतंत्रता के एक वर्ष बाद ही देश में बिचौलियों के उन्मूलन तथा वास्तविक कृषकों को ही भूमि का स्वामी बनाने जैसे कदम उठाये गये। इसका उद्देश्य यह था कि भूमि का स्वामित्व किसानों को भूमि की बेहतरी के लिए निवेश करने की प्रेरणा देगा, बशर्ते उन्हें पर्याप्त पूँजी उपलब्ध कराई जाए।
  • समानता को बढ़ाने के लिये भूमि की अधिकतम सीमा निर्धारण एक दूसरी नीति थी। इसका अर्थ है- किसी व्यक्ति की कृषि भूमि के स्वामित्व की अधिकतम सीमा का निर्धारण करना। इस नीति का उद्देश्य कुछ लोगों में भू-स्वामित्व के संकेद्रण को कम करना था।
  • बिचौलियों के उन्मूलन का नतीजा यह था कि लगभग 2 करोड़ काश्तकरों का सरकार से सीधा संपर्क हो गया तथा वे जमींदारों के द्वारा किये जा रहे शोषण से मुक्त हो गए।
  • भू-स्वामित्व से किसानों को उत्पादन में वृद्धि के लिए प्रोत्साहन मिला। इससे देश के कृषि उत्पादन में वृद्धि हुई।

 

  • बिचौलियों का उन्मूलन कर समानता के लक्ष्य की प्राप्ति निम्नलिखित कारणों की वजह से कई प्रकार बाधित हुई:
  • कानून की कमियों का लाभ उठाकर कुछ भूतपूर्व जमींदारों ने कुछ क्षेत्रों में बहुत बड़े-बड़े भूखंडों पर अपना स्वामित्व बनाए रखा। कुछ मामलों में काश्तकारों को बेदखल कर दिया गया और भू-स्वामियों ने अपने किसान भू-स्वामी (वास्तविक कृषक) होने का दावा किया।
  • कृषकों को भूमि का स्वामित्व मिलने के बाद भी निर्धनतम कृषि श्रमिकों (जैसे: बटाईदार तथा भूमिहीन श्रमिक) को भूमि-सुधारों से कोई लाभ नहीं हुआ।
  • बड़े जमीदारों ने इस कानून को न्यायालयों में चुनौती दी, जिसके कारण इसे लागू करने में देर हुई। इस अवधि में वे अपनी भूमि निकट संबंधियों आदि के नाम कराकर कानून से बच गये।
  • कानून में भी अनेक कमियाँ थी, जिनके कारण बड़े जमीदार भूमि पर अधिकार बनाए रखने में सफल रहे।
  • केरल और पश्चिम बंगाल में भू-सुधार कार्यक्रमों को वहाँ की राज्य-सरकारों की प्रतिबद्धता  कारण विशेष सफलता मिली। अन्य प्रांतों की सरकारों द्वारा इस स्तर का सुधार नहीं हो सका। परिणाम है कि आज तक उत्तर-प्रदेश, बिहार, आंध्र-प्रदेश, महाराष्ट्र आदि प्रदेशों सहित देश भर में जोतों में भारी असमानता बनी हुई है।

  • स्वतंत्रता के समय कृषि क्षेत्र की दशा:
  • देश की 75 प्रतिशत से भी अधिक जनसंख्या कृषि पर आश्रित थी।
  • इस क्षेत्रक में उत्पादकता बहुत ही कम थी, क्योंकि पुरानी प्रौद्योगिकी का प्रयोग किया जाता था और अधिकांश किसानों के पास आधारिक संरचना जैसे सिंचाई आदि का भी अभाव था।
  • भारत की कृषि मानसून पर निर्भर है। यदि मानसून स्तर कम होता था तो किसानों को कठिनाई होती थी, क्योंकि उन्हें सिंचाईं सुविधाएँ उपलब्ध नही थीं।

  • हरित क्रांति और कृषि क्षेत्रक में सुधार: हरित क्रांति का तात्पर्य उच्च पैदावार वाली किस्मों के बीजों (HYV) के प्रयोग से है, विशेषकर गेहूँ तथा चावल उत्पादन में वृद्धि के लिए।

  • हरित क्रांति का पहला चरण (लगभग 1960 के दशक के मध्य से 1970 के दशक के मध्य तक):
  • हरित क्रांति के पहले चरण में HYV (High Yielding Variety: अधिक उपज वाली किस्में) बीजों का प्रयोग पंजाब, आंध्रप्रदेश और तमिलनाडु जैसे अधिक समृद्ध राज्यों तक ही सीमित रहा। इसके अतिरिक्त, HYV बीजों का लाभ केवल गेहूँ पैदा करने वाले क्षेत्रों को ही मिल पाया क्योंकि इन बीजों के प्रयोग के लिए पर्याप्त मात्रा में उर्वरकों, कीटनाशकों तथा निश्चित जल पूर्ति की भी आवश्यकता थी।
  • इन आगतों का सही अनुपात में प्रयोग होना भी महत्त्वपूर्ण था।
  • बीजों की अधिक पैदावार वाली किस्मों से लाभ उठाने वाले किसानों को सिंचाई की विश्वसनीय सुविधाओं और उर्वरकों तथा कीटनाशकों आदि की खरीदारी के लिए वित्तीय संसाधनों की भी आवश्यकता थी।
  • हरित क्रांति का द्वितीय चरण (लगभग 1970 के दशक के मध्य से 1980 के दशक के मध्य तक):
  • हरित क्रांति के द्वितीय चरण में HYV बीजों की प्रौद्योगिकी का विस्तार कई राज्यों तक पहुँचा और कई फसलों को लाभ हुआ।
  • हरित क्रांति प्रौद्योगिकी के प्रसार से भारत को खाद्यान उत्पादन में आत्मनिर्भरता प्राप्त हुई। अब भारत अपने खाद्य संबंधी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अमेरिका या किसी अन्य देश की कृपा पर निर्भर नहीं था।


यदि किसान बाज़ार में बेचने की जगह उत्पादन का अधिकांश भाग स्वयं ही उपभोग करें, तो अधिक उत्पादन से अर्थव्यवस्था पर कुल मिलाकर कोई खास फर्क नहीं पड़ता है। दूसरी ओर, यदि किसान पर्याप्त मात्रा में अपना उत्पादन बाज़ार में बेच सके, तो अधिक उत्पादन का 
निश्चिय ही अर्थव्यवस्था पर प्रभाव पड़ता है, क्योंकि ऐसा होने से बाजार में खाद्यान्न वस्तुओं की भरमार रहती है और आवश्यक वस्तुओं के दाम बहुत ज्यादा नहीं बढ़ते। साथ ही खाद्यान्न बेचकर मिलने वाले पैसों से किसान बाकी वस्तुओं, बच्चों की शिक्षा पर भी धन खर्च करने में सक्षम बनने लग जाते हैं जो अर्थव्यवस्था में अन्य क्षेत्रकों को भी गति देता है| उदहारण के लिए, पिछले कई वर्षों के दौरान अच्छी फसल होने के बाद भारत में दुपहिया वाहनों की बिक्री में तेजी देखी गई|
किसानों द्वारा उत्पादन का बाजार में बेचा गया अंश ही 
‘विपणित अधिशेष’ (Marketed Surplus) कहलाता है।

  • हरित क्रांति के लाभ :
  • हरित क्रांति काल में किसान अपने गेहूँ और चावल के अतिरिक्त उत्पादन का अच्छा खासा भाग बाज़ार में बेच रहे थे। इसके फलस्वरूप खाद्यानों की कीमतों में उपभोग की अन्य वस्तुओं की अपेक्षा कमी आई। भारतीयों के लिए भोजन खरीदना ज्यादा महँगा नहीं रहा|
  • अपनी कुल आय के बहुत बड़े प्रतिशत का भोजन पर खर्च करने वाले निम्न आय वर्गों को खाद्यान्नों की कीमतों में सापेक्ष कमी से बहुत लाभ हुआ।
  • हरित क्रांति के कारण सरकार पर्याप्त खाद्यान्न प्राप्त कर सुरक्षित स्टॉक बना सकी, जिसे खाद्यान्नों की कमी के समय प्रयोग किया जा सकता था।

  • हरित क्रांति से देश बहुत लाभांवित हुआ है पर यह प्रौद्योगिकी पूरी तरह निरापद नहीं है क्योंकि
  • इससे छोटे और बड़े किसानों के बीच असमानताएँ बढ़ने की संभावनाएँ थी, क्योंकि केवल बड़े किसान अपेक्षित आगतों को खरीदने में सक्षम थे जिससे उन्हें हरित क्रांति का अधिकांश लाभ प्राप्त हो जाता था। साथ ही देश में पहले से ही धनी राज्यों में इस प्रौद्योगिकी के प्रयोग से गरीब राज्यों से उनकी आर्थिक सम्पन्नता की दूरी और अधिक बढ़ गई|  
  • इसके अतिरिक्त, इन फसलों में कीटनाशकों के आक्रमण की भी संभावनाएँ अधिक होती हैं। ऐसी दशा में, इस प्रौद्योगिकी को अपनाने वाले छोटे किसानों की फसल का सब कुछ नष्ट हो जाने की सम्भावना भी बानी रहती थी।

  • सरकार द्वारा किए गये कुछ उपाय जिसके कारण क्रांति का लाभ छोटे किसानों को भी मिला:
  • सरकार ने निम्न ब्याज दर पर छोटे किसानों को ऋण दिये और उर्वरकों पर आर्थिक सहायता दी ताकि छोटे किसानों को ये आवश्यक आगत उपलब्ध हो सकें।
  • छोटे किसानों को इन आगतों की प्राप्ति से छोटे खेतों की उपज और उत्पादकता भी समय के साथ बड़े खेतों की उत्पादन क्षमता के बराबर हो गई। इस प्रकार, हरित क्रांति से छोटे-बड़े सभी किसानों को लाभ मिला।
  • सरकार द्वारा स्थापित अनुसंधान संस्थानों की सेवाओं के कारण छोटे किसानों के जोखिम भी कम हो गए, जो कीटनाशकों के आक्रमण से उनकी फसलों की बर्बादी का कारण थे।

यदि सरकार ने इस प्रौद्योगिकी का लाभ छोटे किसानों को उपलब्ध कराने के लिए व्यापक प्रयास नहीं किये होते, तो इस क्रांति का लाभ केवल धनी किसानों को ही मिलता।

  • कृषि सहायिकी पर बहस: 

किसान प्रायः किसी भी नई प्रौद्योगिकी को जोखिम पूर्ण समझते हैं। अर्थशास्त्री सहमत हैं कि इसीलिए किसानों द्वारा और मुख्य रूप से छोटे किसानों द्वारा नई HYV प्रौद्योगिकी को अपनाने के लिए प्रोत्साहन प्रदान करने हेतु सहायिकी दी जानी आवश्यक थी।

  • सहायिकी के विरुद्ध तर्क:
  • कुछ अर्थशास्त्रियों का मत है कि एक बार प्रौद्योगिकी का लाभ मिल जाने तथा उसके व्यापक प्रचलन के बाद सहायिकी धीरे-धीरे समाप्त कर देनी चाहिए, क्योंकि उनका उद्देश्य पूरा हो गया है।
  • सहायिकी का उद्देश्य तो किसानों को लाभ पहुँचाना है, किंतु उर्वरक-सहायिकी का लाभ बड़ी मात्रा में प्राय: उर्वरक उद्योग तथा अधिक समृद्ध क्षेत्र के किसानों को ही पहुँचता है।
  • यह भी माना जाता है कि उर्वरकों पर सहायिकी जारी रखना कोई जरूरी नहीं है। इनसे लक्षित समूह को लाभ नहीं होता और सरकारी कोष पर अनावश्यक भारी बोझ पड़ता है ।

  • सहायिकी के पक्ष में तर्क:

दूसरी ओर कुछ विशेषज्ञों का मत है कि सरकार को कृषि-सहायिकी जारी रखनी चाहिए, क्योंकि

  • भारत में अधिकांश किसान बहुत गरीब हैं और सहायिकी को समाप्त करने से वे अपेक्षित आगतों का प्रयोग नहीं कर पाएँगे।
  • सहायिकी समाप्त करने से गरीब और अमीर किसानों के बीच असमानता और बढ़ेगी तथा समता के लक्ष्य का उल्लंघन होगा।
  • कुछ विशेषज्ञों का तर्क है कि यदि सहायिकी से बड़े किसानों तथा उर्वरक उद्योग को अधिक लाभ हो रहा है तो सही नीति सहायिकी समाप्त करना नहीं, बल्कि ऐसे कदम उठाना है जिनसे केवल निर्धन किसानों को ही इनको लाभ मिले।
  • 1960 के दशक के अंत तक देश में कृषि उत्पादकता की वृद्धि से भारत खाद्यान्नों में आत्मनिर्भर हो गया। यह निश्चय ही गौरवपूर्ण उपलब्धि रही है परंतु 1990 तक भी देश की 65 प्रतिशत जनसंख्या कृषि में लगी हुई थी। भारत में 1950-90 की अवधि में यद्यपि जी.डी.पी. में कृषि के अंशदान में तो भारी कमी आई है, पर कृषि पर निर्भर जनसंख्या के अनुपात में नहीं (जो 1950 में 67.50 प्रतिशत थी और 1990 तक घटकर 64.90 प्रतिशत ही हो पाई)। इसका सबसे बड़ा कारण यही है कि उद्योग क्षेत्रक और सेवा क्षेत्रक इतने विकसित नहीं हो पाए कि कृषि क्षेत्रक में काम करने वाले लोगों को रोज़गार दे पाएँ।
  • उद्योग और व्यापार: हमारी पंचवर्षीय योजनाओं में औद्योगिक विकास पर अत्यधिक बल दिया गया था। क्योंकि
  • उद्योग रोज़गार उपलब्ध कराते हैं और यह कृषि में रोज़गार की अपेक्षा अधिक स्थायी होते हैं।
  • उद्योगों से आधुनिकीकरण और समग्र समृद्धि को बढ़ावा मिलता है।
  • स्वतंत्रता के समय भारत में बहुत कम उद्योग थे। अधिकांश उद्योग सूती वस्त्रपटसन आदि तक ही सीमित थे। जमशेदपुर और कोलकाता में लोहा व इस्पात की सुप्रबंधित फर्में थीं। यदि अर्थव्यवस्था का विकास करना था, तो हमें ऐसे औद्योगिक आधार का विस्तार करने की आवश्यकता थी जिसमें विविध प्रकार के उद्योग हों।
  • स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भारत के औद्योगिक क्षेत्रक में सुधार करने के लिए सरकार को महत्वपूर्ण भूमिका निभानी पड़ी क्योंकि :
  • भारत के उद्योगपतियों के पास भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास हेतु उद्योगों में निवेश करने के लिए अपेक्षित पूँजी नहीं थी।
  • उस समय इतना बड़ा बाज़ार भी नहीं था, जिसमें उद्योगपतियों को मुख्य परियोजनाएँ शुरू करने के लिए प्रोत्साहन मिलता।

इन्हीं कारणों से सरकार को औद्योगिक क्षेत्र को प्रोत्साहन देने में व्यापक भूमिका निभानी पड़ी। इसीलिए द्वितीय पंचवर्षीय योजना में यह निर्णय लिया गया कि सरकार अर्थव्यवस्था में बड़े तथा भारी उद्योगों का नियंत्रण करेगी। इसका अर्थ यह था कि सरकार उन उद्योगों पर पूरा नियंत्रण रखेगी, जो अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण थे। निजी क्षेत्रक की नीतियाँ सार्वजनिक क्षेत्रक की नीतियों के अनुपूरक होंगी और सार्वजनिक क्षेत्रक अग्रणी भूमिका निभाएगा

  • औद्योगिक नीति प्रस्ताव, 1956:
  • भारी उद्योगों पर नियंत्रण रखने के सरकार के लक्ष्य के अनुसार औद्योगिक नीति प्रस्ताव, 1956 को अपनाया गया।
  • इस प्रस्ताव को द्वितीय पंचवर्षीय योजना का आधार बनाया गया।
  • इस प्रस्ताव के अनुसार उद्योगों को तीन वर्गों में वर्गीकृत किया गया।
(क) प्रथम वर्ग में वे उद्योग शामिल थे, जिन पर सरकार का एकमात्र स्वामित्व था।
(ख) दूसरे वर्ग में वे उद्योग शामिल थे, जिनके लिए निजी क्षेत्रक, सार्वजनिक क्षेत्रक के साथ मिल कर प्रयास कर सकते थे, परंतु जिनमें नई इकाइयों को शुरू करने की एकमात्र ज़िम्मेदारी सरकार की होती थी।
(ग) तीसरे वर्ग में वे उद्योग शामिल थे, जो निजी क्षेत्रक के अंतर्गत आते थे। इस क्षेत्रक के लाइसेंस पद्धति के माध्यम से राज्य के नियंत्रण में रखा गया। नये उद्योगों को तब तक अनुमति नहीं दी जाती थी, जब तक सरकार से लाइसेंस प्राप्त नहीं कर लिया जाता था।

औद्योगिक नीति प्रस्ताव, 1956 के उद्देश्य :


  • इस नीति का प्रयोग पिछड़े क्षेत्रों में उद्योगों को प्रोत्साहित करने के लिए किया गया था। उन इकाइयों को कुछ रियायतें जैसे, कर लाभ तथा कम प्रशुल्क पर बिजली दी गई जो पिछड़े क्षेत्रों में उद्योग लगाने के लिए आगे आईं।
  • क्षेत्रीय समानता को बढ़ावा देना।
  • इस नीति का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि उत्पादित वस्तुओं की मात्रा अर्थव्यवस्था द्वारा अपेक्षित मात्रा से अधिक न हो। उत्पादन बढ़ाने का लाइसेंस केवल तभी दिया जाता था जब सरकार इस बात से आश्वस्त होती थी कि अर्थव्यवस्था में बड़ी मात्रा में वस्तुओं की आवश्यकता है।

  • लघु उद्योग: लघु उद्योग की परिभाषा किसी इकाई की परिसंपत्तियों के लिए किए जाने वाले अधिकतम निवेश के संदर्भ में दी जाती है। समय के साथ-साथ निवेश की सीमा भी बदलती रही है।
  • 1950 में लघु औद्योगिक इकाई उसे कहा जाता था, जो अधिकतम पाँच लाख रु. का निवेश करती थी।
  • इस समय, लघु उद्योग में अधिकतम एक करोड़ रु. तक का निवेश किया जा सकता है।

  • ऐसा माना जाता था कि लघु उद्योग अधिक श्रम-प्रधान होते हैं, अर्थात् उनमें बड़े पैमाने के उद्योगों की अपेक्षा श्रम का अधिक प्रयोग किया जाता है। अतः वे अधिक रोज़गारों का सृजन करते हैं। 
  • लेकिन, ये बड़ी औद्योगिक फर्मों के साथ प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकते। इसीलिए लघु उद्योगों के विकास के लिए बड़ी फर्मों से उनकी रक्षा किये जाने की आवश्यकता है। इस उद्देश्य के लिए, अनेक उत्पादों को लघु उद्योग के लिए आरक्षित कर दिया गया। उन्हें अन्य रियायतें भी दी गई थीं जैसे, कम उत्पाद शुल्क तथा कम ब्याज़ दरों पर बैंक ऋण।

  • व्यापार नीति: आयात प्रतिस्थापन

प्रथम सात पंचवर्षीय योजनाओं में व्यापार नीति की विशेषता अंतर्मुखी व्यापार नीति थी। तकनीकी रूप से इस नीति को आयात-प्रतिस्थापन (Import Substitution) कहा जाता है। इस नीति का उद्देश्य आयात के बदले घरेलू उत्पादन द्वारा पूर्ति करना है। उदाहरण के लिए, विदेश में निर्मित वाहनों का आयात करने के स्थान पर उन्हें भारत में ही निर्मित करने के लिए उद्योगों को प्रोत्साहित किया जाए। इस नीति के अनुसार, सरकार ने विदेशी प्रतिस्पर्धा से घरेलू उद्योगों की रक्षा की।

  • आयात संरक्षण के दो प्रकार थेः प्रशुल्क (Tariff) और कोटा (Quota)
  • प्रशुल्क, आयातित वस्तुओं पर लगाया गया कर है। प्रशुल्क लगाने पर आयातित वस्तुएँ अधिक महँगी हो जाती हैं, जो वस्तुओं के आयात को हतोत्साहित करती हैं।
  • कोटे में वस्तुओं की वह मात्रा निर्दिष्ट होती है जिसे आयात किया जा सकता है।
  • प्रशुल्क और कोटे का प्रभाव यह होता है कि उनसे आयात प्रतिबंधित हो जाते हैं और इस प्रकार विदेशी प्रतिस्पर्धा से देशी फर्मों की रक्षा होती है।

  • संरक्षण की नीति इस धारणा पर आधारित थी कि विकासशील देशों के उद्योग अधिक विकसित देशों द्वारा उत्पादित वस्तुओं से प्रतिस्पर्धा करने की स्थिति में नहीं थे। यह माना जाता था कि यदि घरेलू उद्योगों का संरक्षण किया जाता है, तो समय के साथ वे प्रतिस्पर्धा करना भी सीख लेंगे।

  • औद्योगिक विकास पर नीतियों का प्रभाव:

प्रथम सात पंचवर्षीय योजनाओं के दौरान भारत के औद्योगिक क्षेत्रक की उपलब्धियाँ उल्लेखनीय रही  हैं।

            सकारात्मक पहलू:

  • औद्योगिक क्षेत्रक द्वारा अर्पित जी.डी.पी. का अनुपात 1950-51 में 13 प्रतिशत से बढ़कर 1990-91 में 24.6 प्रतिशत हो गया। जी.डी.पी. में उद्योगों की हिस्सेदारी में बढ़ोतरी औद्योगिक विकास का एक महत्वपूर्ण सूचक है।
  • इस अवधि के दौरान औद्योगिक क्षेत्रक की 6 प्रतिशत वार्षिक संवृद्धि दर प्रशंसनीय है। आजादी के वक्त भारतीय उद्योग मुख्यतः सूती वस्त्र और पटसन तक ही सीमित थे। इन सात पंचवर्षीय योजनाओं के बाद औद्योगिक क्षेत्रक प्रायः सार्वजनिक क्षेत्रक की सक्रिय भूमिका के कारण विविधतापूर्ण बन गया था।
  • लघु उद्योगों के संवर्धन से उन लोगों को अवसर प्राप्त हुए जिनके पास व्यवसाय में प्रवेश करने के लिए बड़े फर्मों को प्रारंभ करने हेतु पूँजी नहीं थी।
  • विदेशी प्रतिस्पर्धा के प्रति संरक्षण से उन इलेक्ट्रॉनिकी व ऑटोमोबाइल क्षेत्रकों में देशी उद्योगों का विकास हुआ, जिनका विकास अन्यथा संभव नहीं था।

नकारात्मक पहलू:

  • सरकारी उद्यमों ने कुछ वस्तुओं एवं सेवाओं का उत्पादन (प्रायः उन पर एकाधिकार रखते हुए) जारी रखा, जिनकी कोई आवश्यकता नहीं रह गई थी| जैसे दूरसंचार सेवा, मॉडर्न ब्रेड विनिर्माण आदि, क्योंकि निजी क्षेत्रक की फर्म्स भी इनका निर्माण कर सकने में सक्षम हो चुके थे।
  • इस आधार पर कुछ विद्वानों ने यह तर्क दिया है कि राज्य को उन क्षेत्रों से हट जाना चाहिए जिनमें निजी क्षेत्रक कार्य कर सकते हैं। सरकार ऐसी महत्वपूर्ण सेवाओं पर संसाधनों का संकेंद्रण कर सकती है, जिन्हें निजी क्षेत्रक उपलब्ध नहीं करा सकते।
  • अनेक सार्वजनिक क्षेत्रक की फर्मों ने भारी नुकसान उठाया था, लेकिन उन्होंने काम जारी रखा क्योंकि लोकतंत्र में किसी सरकारी उपक्रम का बंद किया जाना कठिन है। भले ही इस के कारण राष्ट्र के सीमित संसाधनों का निकास होता रहे।
  • उद्योगपति अपने उत्पादन के विषय में विचार करने की अपेक्षा लाइसेंस प्राप्त करने की कोशिश में और संबंधित मंत्रालयों में लॉबी (सिफ़ारिश) करने में समय व्यतीत करते थे।

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