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A story of an unknown journey' by- Sushil Dobhal' अनजान सफर के वह सात दिन'- सुशील डोभाल,



भाग-2
सुबह धूप नहीं थी। आसमान पर धुंध की एक पतली चादर बिछी थी और हवा में लोहे जैसी गंध। अब लेकी उठ चुकी थी। उसने थुपा वाले पत्थरों को देखा। रात को रखे त्सम्पा के कौर गायब थे। वो कुछ नहीं बोली, बस सिर झुकाकर फिर से हाथ जोड़ लिए। थैले से बचा हुआ थोड़ा त्सम्पा निकालकर मेरे हाथ में दिया। "आज पानी कम पीना। आगे चढ़ाई है और देवता का इलाका शुरू होगा। वहाँ बोलना कम, सुनना ज़्यादा।"

  हम खंडहर से निकले। बाहर मखमली घास पर ओस की जगह छोटे-छोटे कदमों के निशान थे। इंसान के नहीं। किसी बड़े पंजे के, पर उंगलियाँ तीन ही थीं। निशान सीधे पहाड़ की तरफ जा रहे थे, उसी रास्ते पर जहाँ हमें जाना था।

   लेकी ने निशानों को देखकर अपनी कमर से बंधी ऊन की डोरी खोल ली और मेरी कलाई पर बाँध दी। "ये निशानी है। रास्ता भटको तो ये गर्म हो जाएगी।" उसकी टूटी-फूटी हिंदी आज और साफ लग रही थी, जैसे डर ने शब्द सिखा दिए हों। मैंने पीछे मुड़कर खंडहर को देखा। दरवाज़े पर अब कोई छाया नहीं थी। पर दीवार पर कोयले से बना एक नया निशान उभर आया था। तीन आड़ी लकीरें। लेकी आगे बढ़ चुकी थी। मैं डोरी को मुट्ठी में भींचकर उसके पीछे चल पड़ा। 
  चढ़ाई शुरू होते ही घास भी खत्म हो गई। अब सिर्फ काले पत्थर और ढीली बजरी थी। हर कदम पर पैर फिसलता, जैसे पहाड़ खुद हमें नीचे धकेल रहा हो। हवा इतनी पतली कि दो बात करने पर साँस फूल जाए। 
दोपहर तक हम एक तंग दर्रे पर पहुँचे। दोनों तरफ सीधी दीवारें और बीच में बस एक आदमी के निकलने की जगह। लेकी रुक गई। उसने आँखें बंद करके हवा को सूंघा। फिर फुसफुसाई, "यहीं से उनका इलाका है। अब पीछे मत देखना। जो भी आवाज़ आए।"

हम दर्रे में घुसे। दीवारें इतनी पास कि कंधे छिलने लगे। तभी पीछे से किसी के चलने की आवाज़ आई। बजरी पर पैर पड़ने की, धीमी पर साफ। एक, दो, तीन। फिर रुकी। फिर शुरू। मेरे कान गर्म हो गए। कलाई पर बंधी ऊन की डोरी में हल्की गर्माहट आने लगी।

लेकी ने पलटकर नहीं देखा। बस अपना हाथ पीछे बढ़ाया और मेरी हथेली कसकर पकड़ ली। उसका हाथ बर्फ जैसा ठंडा था। वो लगातार कुछ बुदबुदा रही थी। तिब्बती मंत्र शायद।
  लेकी ने मेरी कलाई छोड़ दी। डोरी अब तप रही थी। वो घाटी की तरफ देखकर बोली, "पहुँच गए। यही वो जगह है जहाँ देवता इंसानों का हिसाब लेते हैं।"

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