मनमाने कार्ययोजित आदेशों पर शिक्षकों में आक्रोश, राजकीय शिक्षक संघ ने बिना मानकों के कार्योजित आदेशों को तत्काल रद्द करने की उठाई मांग
स्थानांतरण अधिनियम में प्रावधान न होने के बावजूद शिक्षकों को मनमाने ढंग से कार्ययोजित (सम्बद्ध) किए जाने को लेकर राजकीय शिक्षक संघ ने गंभीर नाराजगी व्यक्त करते हुए निदेशक माध्यमिक शिक्षा से ऐसे कार्योजित आदेशों को तत्काल रद्द करने का आग्रह किया है। गौरतलब है कि विभाग द्वारा कुछ शिक्षकों को देहरादून के विद्यालयों में कार्योजित करने के आदेश के स्क्रीनशॉट सोशल मीडिया पर प्रसारित होने पर शिक्षकों में बिना मानकों के ऐसे आदेशों के खिलाफ जबरदस्त नाराजगी व्याप्त हुई है। उधर राजकीय शिक्षक संघ प्रांतीय कार्यकारिणी भी इस मुद्दे पर एक्शन मोड़ में है।
संघ के प्रांतीय अध्यक्ष रविंद्र सिंह राणा और महामंत्री डॉ अंकित जोशी ने निदेशक माध्यमिक शिक्षा से ऐसे मनमाने आदेशों को तत्काल निरस्त करने की मांग की है। उन्होंने निदेशक को भेजे ज्ञापन में कहा हैं कि राजकीय शिक्षक संघ, उत्तराखण्ड के संज्ञान में आया है कि विभाग द्वारा कुछ शिक्षकों को कार्ययोजित (सम्बद्ध) किए जाने संबंधी आदेश निर्गत किए गए हैं। राजकीय शिक्षक संघ का स्पष्ट मत है कि वर्तमान में प्रभावी उत्तराखण्ड लोक सेवकों के वार्षिक स्थानातरण अधिनियम, 2017 एवं उसके अधीन प्रचलित व्यवस्थाओं में शिक्षकों को इस प्रकार कार्ययोजित किए जाने का कोई स्पष्ट वैधानिक प्रावधान उपलब्ध नहीं है। ऐसी स्थिति में इन आदेशों का विधिक आधार, प्रक्रिया एवं औचित्य स्वाभाविक रूप से प्रश्नों के घेरे में आता है। संघ का मानना है कि शासन एवं विभाग की प्रत्येक प्रशासनिक कार्यवाही विधिसम्मत, पारदर्शी, वस्तुनिष्ठ तथा समानता के सिद्धान्तों पर आधारित होनी चाहिए। यदि कुछ शिक्षकों को व्यक्तिगत आधारों पर कार्ययोजित किया जाता है, जबकि समान अथवा उससे भी अधिक गंभीर परिस्थितियों वाले अन्य शिक्षक इस अवसर से वंचित रह जाते हैं, तो ऐसी व्यवस्था न केवल समान अवसर के सिद्धांत के प्रतिकूल प्रतीत होती है, बल्कि विभागीय कार्यप्रणाली की निष्पक्षता, पारदर्शिता एवं विश्वसनीयता पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न लगाती है।
विशेष चिंता का विषय यह है कि शिक्षकों को कार्ययोजित करने जैसी व्यवस्था, यदि किसी स्पष्ट वैधानिक प्रावधान, पूर्वनिर्धारित नीति अथवा पारदर्शी प्रक्रिया के अभाव में अपनाई जाती है, तो इससे मनमाने निर्णयों, पक्षपात एवं भेदभाव की आशंकाएँ स्वतः उत्पन्न होती हैं। ऐसी व्यवस्था न केवल सुशासन एवं विधि के शासन की भावना के विपरीत है, बल्कि शिक्षक समाज में असंतोष एवं अविश्वास को भी जन्म देती है। यदि वास्तव में कुछ शिक्षक गंभीर चिकित्सीय अथवा अत्यंत विषम पारिवारिक परिस्थितियों से प्रभावित हैं, तो उनके लिए राहत उपलब्ध कराने का मार्ग भी विधिसम्मत, पारदर्शी तथा सभी शिक्षकों पर समान रूप से लागू होने वाली नीति होना चाहिए, न कि ऐसे आदेश जिनके समर्थन में कोई स्पष्ट वैधानिक प्रावधान उपलब्ध न हो।
अतः राजकीय शिक्षक संघ, उत्तराखण्ड आपसे आग्रह करता है कि स्थानांतरण अधिनियम की भावना एवं विधिक प्रावधानों के अनुरूप शिक्षकों को कार्ययोजित किए जाने संबंधी समस्त आदेशों का तत्काल पुनरीक्षण करते हुए उन्हें निरस्त करने की कृपा कीजिएगा।

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