उत्तराखंड के 200 माध्यमिक विद्यालयों में व्यावसायिक शिक्षा अधर में, मार्च में अनुबंध पूरा होने के बाद बने यह हालात, प्रशिक्षक भी हुए बेरोजगार
उत्तराखंड के 200 सरकारी स्कूलों में छात्रों की व्यावसायिक शिक्षा बीच में छूट गई है। विभाग अभी तक स्थिति साफ ही नहीं कर पा रहा है। कार्यदायी कंपनी का अनुबंध पूरा होने के कारण यह हालात बने है। इससे जहां छात्रों की व्यावसायिक शिक्षा अधूरी छूट गई वहीं करीब 250 प्रशिक्षक भी बेरोजगार हो गए हैं।
उत्तराखंड में पिछले सत्र में कुल 531 सरकारी स्कूलों में छात्रों को व्यावसायिक शिक्षा दी जा रही थी। मार्च में कंपनी का अनुबंध पूरा होने के साथ 200 स्कूलों में व्यावसायिक पाठ्यक्रम को पढ़ाई बंद पड़ी है।
इसके लिए तैनात 255 व्यावसायिक प्रशिक्षक भी बेरोजगार घूम रहे हैं। उम्मीद की जा रही थी कि जुलाई से इन स्कूलों में भी विधिवत व्यावसायिक पाठ्यक्रम की पढ़ाई शुरू हो जाएगी, लेकिन ऐसा अभी तक नहीं हो पाया। इधर, सरकार 544 नए स्कूलों में व्यावसायिक पाठ्यक्रम शुरू करने की घोषणा भी कर चुकी है। लेकिन विभाग उन 200 स्कूलों पर कोई फैसला नहीं ले सका है। निदेशालय स्तर से शासन को भेजे गए एमओयू को अभी तक अंतिम मंजूरी नहीं मिलने से इसमें देरी हो रही है। इसका खामियाजा छात्रों और व्यावसायिक प्रशिक्षकों को उठाना पड़ रहा है।
समग्र शिक्षा के अपर परियोजना निदेशक कुंवर सिंह रावत का कहना है कि अनुबंध को लेकर शासन स्तर पर प्रस्ताव भेजा गया है, जल्द ही नए अनुबंध कर पाठ्यक्रम शुरू कराया जाएगा।
बोर्ड परीक्षार्थियों का रिजल्ट होगा प्रभावित
इन 200 स्कूलों में पढ़ रहे ऐसे छात्र सबसे ज्यादा परेशान हैं, जिन्होंने व्यावसायिक शिक्षा विषय लिया है और इस बार उनकी बोर्ड परीक्षा है। नए सत्र में उनकी पढ़ाई तक शुरू नहीं हो पाई है, ऐसे में उनका रिजल्ट प्रभावित हो सकता है।
अक्तूबर में रोजगार मेले की तैयारी
एक तरफ स्कूलों में व्यावसायिक शिक्षा बंद पड़ी है। वहीं, इस साल बोर्ड परीक्षा में सफल रहे छात्रों के लिए अक्तूबर में रोजगार मेला आयोजित करने की तैयारी चल रही है। इसे वहीं कपनी आयोजित कर रही है, जिससे 200 स्कूलों का अनुदेव खत्म हो गया है और वह बाकी 331 स्कूलों में व्यावसायिक शिक्षा पाठ्यक्रम को संचालित कर रही है।
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| एस पी सेमवाल, सेवानिवृत्त शिक्षा अधिकारी और शिक्षाविद् |
इस मुद्दे पर सेवानिवृत्त अपर निदेशक माध्यमिक शिक्षा और जानेमाने शिक्षाविद् शिव प्रसाद सेमवाल का कहना है कि इसे पॉलिसी पैरालाइसिस कहेंगे, हैरान करने वाला तथ्य है कि नई शिक्षा नीति के एक महत्वपूर्ण अंश की इस तरह अनदेखी की जा रही है, सेवा के दौरान ही ये बात मेरे संज्ञान में थी कि मध्यस्थ एजेंसी किस तरह तकनीकी रूप से कुशल अनुदेशक युवाओं का शोषण कर रही थी, उनके मानदेय का 30 फीसदी हिस्सा कमीशन में वसूला जा रहा था, बेकारी की मार झेल रहे कुशल युवाओं के लिए व्यावसायिक शिक्षा में योगदान आर्थिक उपलब्धि और जीविका से अधिक सामाजिक सम्मान का आधार था कि वे बेकार नहीं हैं।


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