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A story of an unknown journey' by- Sushil Dobhal' अनजान सफर के वह सात दिन'- सुशील डोभाल,

 
लेकी कोई 30-35 साल की महिला थी। मुझे नहीं मालूम कि वह विवाहित थी या अविवाहित। वह अपनी मातृभाषा तिब्बती के अलावा एक गाइड के रूप में टूटी-फूटी हिंदी बोल सकती थी जो मुझे समझाने के लिए काफी थी। ऊबड़-खाबड़ पगडंडियों और पथरीले वीरान रास्तों से होते हुए कई घंटे के सफर के बाद हम शाम के वक्त चारों ओर पहाड़ों से घिरी हुई एक समतल भूमि पर पहुंच गए। यहां से आगे के सफर को लेकर उसने जोखिम की संभावना व्यक्त करते हुए यहीं पड़ाव डालने के लिए कहा। चारों तरफ वीरान पहाड़, पेड़ पौधों का कहीं नामोनिशान नहीं, बस कहीं-कहीं पर छोटी मखमली घास देख ऐसा प्रतीत होता मानो किसी अजनबी दुनिया में आ गए। यहीं कभी मिट्टी और पत्थरों से बना लेकिन अब खंडहर हो चुका चरवाहों का घर हमारा पड़ाव बना था।
  लेकी ने अपने थैले से त्सम्पा निकालकर मुझे फिर से खाने को दिया। इस सफर में बस पानी के साथ एक त्सम्पा ही था जिसे खाकर हम अपनी भूख मिटा सकते थे, और अब तो मुझे भी इसका स्वाद कुछ ठीक लगने लगा था। लेकी ने मुझे सोने से पहले कुछ स्थानीय देवताओं के बारे में जानकारी देते हुए उनका अभिवादन करने का विशेष तरीका भी समझाया और बताया कि बाहरी व्यक्तियों की गतिविधियों पर उनकी बड़ी नजर रहती है। 


   रात होते ही हवा और तेज़ हो गई। खंडहर के पत्थरों की दरारों से सनसनाहट ऐसी आ रही थी मानो कोई फुसफुसाकर नाम ले रहा हो। लेकी ने दीवार के एक कोने में छोटे-छोटे पत्थरों से थुपा बनाया और उस पर त्सम्पा के तीन कौर रख दिए। फिर दोनों हाथ जोड़कर सिर झुकाया और होंठ ही होंठ में कुछ बुदबुदाया। उसकी आँखें बंद थीं, पर चेहरे पर डर नहीं, एक अजीब सी शांति थी। मेरी तरफ मुड़ी और धीमी आवाज़ में बोली, "सोने से पहले दरवाज़ा मत देखना। वो आते हैं तो आहट नहीं करते, बस छाया लंबी हो जाती है।" कहकर वो दीवार से पीठ लगाकर बैठ गई। मैं खंडहर की टूटी छत से दिखते आसमान को ताकता रहा। तारे तो थे, पर उनके बीच का खालीपन आज कुछ ज़्यादा ही गहरा लग रहा था।

   नींद आई ही नहीं। आधी रात के करीब हवा एकदम से थम गई। सन्नाटा इतना गहरा कि अपनी साँस की आवाज़ भी पहाड़ से टकराकर लौटती लगे। तभी खंडहर के दरवाज़े पर छाया हिली। मैंने लेकी की बात मानकर उधर देखा नहीं, बस नज़रें ज़मीन पर गड़ा दीं। पर परछाई लंबी होकर मेरे पैरों तक आ गई। ठंडी, बिना गरमी वाली। लेकी अब भी दीवार से लगी बैठी थी। उसकी उंगलियाँ लगातार थुपा वाले पत्थरों को छू रही थीं। वो फुसफुसाई, "डरना मत। ये सिर्फ देख रहे हैं कि तुम मेहमान हो या दखलंदाज़।" 

मैंने हिम्मत करके त्सम्पा का एक कौर उठाया और थुपा पर रख दिया। उसी पल छाया सिमट गई। हवा फिर चलने लगी, जैसे किसी ने लंबी साँस छोड़ी हो। लेकी हल्का सा मुस्कुराई। "देवता मान गए। अब सो जाओ। सुबह का रास्ता और मुश्किल है।"

बाहर आसमान में तारों के बीच का खालीपन अब उतना डरावना नहीं लग रहा था। भाग - 2



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